मनाया विश्व बाँस दिवस
बादा से सनम मलिक की रिपोर्ट
बांदा-बाँस जिसको हरा सोना भी बोला जाता है और यह जनमानस के जीवन स्तर को बढ़ाने का कार्य भी करता है। विश्वविद्यालय के कुलपति डा०एस० वी०एस० ने इस दिवस के महत्व को उजागर करते हुये बताया कि विश्व में बाँस की लगभग 150 से ज्यादा प्रजातियाँ मौजूद है।130 से अधिक प्रजातियाँ भारत में स्थित है।किसानों ने और किसान परिवार ने बाँस आधारित खेती प्रणाली को अवलम्बित करना जरूरी है।साथ साथ अपने कृषि कार्यों मे बाँस और बाँस आधारित वस्तुओ को सम्मिलित करने का अनुग्रह किया।आने वाला समय बाँस का और बाँस आधारित कार्य प्रणाली का समय है।अधिष्ठाता वानिकी ने अपने महाविद्यालय के छात्र और छात्राओं को बाँस से जुड़े वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के लिये प्रेरित किया।मुख्य रूप से यह दर्शाया कि महाविद्यालय स्थित काष्ठशाला में छात्र,छात्राओं द्वारा बांस आधारित विभिन्न हस्तशिल्प बनाने का कार्य भी किया जाता है।नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में बने बाँस आधारित वस्तुओं तथा उसके उपयोग के बारे में जानकारी साझा की। इस दिवस के उपलक्ष्य में अधिष्ठाता वानिकी और उनके सहयोगी द्वारा छात्र और छात्राओं के साथ बाँस के पौधरोपण तथा विश्वविद्यालय प्रांगण मे स्थित बम्बूसेटम का भ्रमण करवाया गया।उपस्थित विविध बांस प्रजातियों के बारे मे डॉ चन्द्रकांत तिवारी द्वारा छात्र छात्राओं के साथ जानकारी साझा की गई।छात्र छात्राओं को बाँस लोक जीवन मे कितना महत्वपूर्ण है उसके संबंध में एक लघु प्रस्तुति भी दिखाई गयी।
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