जहाँ कुर्सियों पर सत्ता नहीं, संवेदनशीलता बैठती है~~~~~~~~
यह किसी बड़े अधिकारी का भव्य कार्यालय नहीं है। न ही यहाँ चमचमाते फर्नीचर या वातानुकूलित सुविधाएँ हैं। यह बिहार के एक सरकारी विद्यालय का कार्यालय है—लेकिन इसकी सादगी में जो गरिमा है, वही इसे असाधारण बनाती है।
इस कमरे में रखी कुर्सियों पर कोई पद नहीं बैठता, यहाँ बैठती है बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी। इन फाइलों में आदेशों की भाषा नहीं, बल्कि उन सपनों की दर्ज पंक्तियाँ हैं, जिनमें एक बेहतर कल आकार लेता है।
सीमित संसाधनों के बीच खड़ा यह विद्यालय एक मौन संदेश देता है—कि बदलाव के लिए साधनों की नहीं, सोच की आवश्यकता होती है। जब किसी शिक्षक के मन में संवेदनशीलता हो और कर्तव्यबोध उसकी रीढ़ बने, तो अभाव भी बाधा नहीं बन पाते।
यह तस्वीर उन सभी के लिए प्रेरणा है जो यह मान लेते हैं कि सरकारी विद्यालय कुछ नहीं कर सकते। सच इसके उलट है। यदि नीयत साफ हो, नेतृत्व जिम्मेदार हो और दृष्टि बच्चों पर केंद्रित हो, तो सरकारी विद्यालय भी अनुशासन, नवाचार और गरिमा के प्रतीक बन सकते हैं।
यह रिपोर्ट केवल एक कमरे की कहानी नहीं है, यह उस सोच की कहानी है जो व्यवस्था को भीतर से बदल सकती है। यह हर शिक्षक, हर प्रधानाध्यापक और हर जिम्मेदार नागरिक को यह याद दिलाती है—कि यदि इरादे मजबूत हों, तो सरकारी शिक्षा भी उम्मीद की सबसे उजली मिसाल बन सकती है।
➡️प्राथमिक विद्यालय दवनपुर
➡️प्रखंड- भगवानपुर,कैमूर (बिहार)
➡️प्रधान शिक्षक- सिकेंद्र कुमार सुमन












