पत्रकारिता की दुर्दशा: भ्रष्टाचार के साए में विज्ञापन की साजिश
बांदा में भ्रष्टाचार और माफियाओं का तांडव जिस तरह से जारी है, उसमें पत्रकारिता ही एकमात्र ढाल बनी हुई है। अधिकारी, कर्मचारी, नेता और अभिनेता हो या पीड़ित आमजन, सभी की उम्मीदें अखबारों के पन्नों पर टिकी रहती हैं। एक खबर छपते ही कार्यवाही की आस जागती है, भले ही वह कभी हो न, लेकिन सामने वाले को आत्मिक संतोष मिल जाता है। लेकिन यह विश्वास अब धोखे की बुनियाद पर खड़ा है, जहां पत्रकारों को साल भर तो इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन त्योहारों के समय उन्हें ठेंगा दिखा दिया जाता है। यह दोहरा चरित्र न केवल पत्रकारिता को कमजोर करता है, बल्कि समाज की न्याय की लड़ाई को भी कुंद कर देता है।
नेता और अभिनेता तो मीडिया का सहारा लेकर ही अपनी छवि चमकाते हैं, चर्चा में बने रहने के लिए अखबारों को अपना हथियार बनाते हैं। अधिकारी और कर्मचारी भी अपना ‘गुडवर्क’ जनता तक पहुंचाने के लिए पत्रकारों की कलम पर निर्भर रहते हैं। लेकिन जैसे ही 15 अगस्त, 26 जनवरी, दशहरा, दीपावली या होली जैसे त्योहार आते हैं, ये सभी संपर्क माध्यम स्विच ऑफ कर देते हैं। विज्ञापन की उम्मीद में बैठे मीडियाकर्मी ठगे रह जाते हैं। यह घिनौनी साजिश है, जहां पत्रकारों को साल भर की मेहनत का फल देने की बजाय, उन्हें अपमानित किया जाता है। ऐसे में पत्रकारिता कैसे मजबूत रहेगी?
अब तो पत्रकारिता में भी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई जा रही है। गिने-चुने लोगों को ही विज्ञापन दिए जाते हैं, वह भी उनको निजी निवास या कार्यालयों में बुलाकर। चाहे वह माननीयों के घर हों या अधिकारियों के दफ्तर, यह चयनित सर्कल ही लाभान्वित होता है। जो पत्रकार पूरे साल भ्रष्टाचार और माफियाओं के खिलाफ लिखते रहते हैं, वे वंचित रह जाते हैं। यह विभेद न केवल अनैतिक है, बल्कि पत्रकारिता की नींव को खोखला कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये ताकतवर लोग पत्रकारों को अपना गुलाम समझते हैं?
यह प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को और बढ़ावा दे रही है, क्योंकि जब पत्रकार आर्थिक रूप से कमजोर होंगे, तो उनकी कलम की धार कुंद हो जाएगी। माफियाओं का तांडव बिना किसी रोक-टोक के जारी रहेगा, और आमजन की पीड़ा अखबारों के पन्नों तक पहुंचने से पहले ही दबा दी जाएगी। त्योहारों के समय यह विज्ञापन की राजनीति न केवल पत्रकारों का अपमान है, बल्कि पूरे समाज का मजाक है। जो लोग साल भर मीडिया का सहारा लेते हैं, वे अब अपने फायदे के लिए पत्रकारों में फूट डाल रहे हैं। यह घोर अन्याय है, जो तुरंत बंद होना चाहिए।
पत्रकारों को अब चुप नहीं रहना चाहिए; उन्हें इस साजिश के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठानी होगी। भ्रष्टाचार और माफियाओं के विरुद्ध लड़ाई तभी मजबूत होगी, जब पत्रकारिता आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहेगी। विज्ञापन देने वाले इन ताकतवरों को सबक सिखाना जरूरी है कि पत्रकार उनकी कठपुतली नहीं हैं। साल भर की मेहनत का सम्मान न करने वालों को अब बेनकाब किया जाए। यह समय है कि पत्रकारिता जगत इस विभेद को समाप्त करे और न्याय की मांग करे।
अंत में, बांदा जैसे इलाकों में जहां भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं, पत्रकारिता ही आखिरी उम्मीद है। लेकिन अगर त्योहारों में विज्ञापन की यह साजिश जारी रही, तो पत्रकारिता का विश्वास टूट जाएगा। सभी पक्षों को समझना चाहिए कि पत्रकारों का अपमान समाज का अपमान है। कड़े शब्दों में कहें तो यह समय है कि ये नेता, अधिकारी और अभिनेता अपनी नीच राजनीति बंद करें, अन्यथा पत्रकारों की कलम उनके खिलाफ और तेज हो जाएगी। न्याय की लड़ाई में पत्रकारिता को मजबूत बनाएं, न कि कमजोर। बांदा से सनम की रिपोर्ट












