मिड-डे मील को लेकर विवादित बयान देना पड़ा भारी, विशिष्ट शिक्षक पवन निलंबित
डॉ.राहुल कुमार द्विवेदी, बिहार संपादक, अखंड भारत न्यूज़।
जिले के डुमरा प्रखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय पोखर टोल, बरियारपुर से जुड़ा एक मामला इन दिनों शिक्षा विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है। विद्यालय के विशिष्ट शिक्षक पवन कुमार का मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) योजना को लेकर दिया गया विवादित बयान और उससे जुड़ा वायरल वीडियो आखिरकार उनके निलंबन का कारण बन गया। शिक्षा विभाग ने इसे अनुशासनहीनता, विभागीय आदेशों की अवहेलना और सरकारी योजना की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला गंभीर मामला मानते हुए कड़ी कार्रवाई की है। मामले की जड़ 13 दिसंबर 2025 की एक घटना से जुड़ी बताई जा रही है, जब विद्यालय में किसी बात को लेकर विवाद हुआ। उसी से संबंधित एक वीडियो और बाद में दिया गया इंटरव्यू सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो के संज्ञान में आने के बाद जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (माध्यमिक शिक्षा एवं साक्षरता) के निर्देश पर पूरे मामले की स्थलीय जांच कराई गई। जांच के दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने शिक्षक की कार्यशैली और आचरण पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जांच रिपोर्ट के अनुसार, विशिष्ट शिक्षक पवन कुमार मध्यान्तर (लंच ब्रेक) के बाद अक्सर अन्य कार्यों का हवाला देकर विद्यालय से अनुपस्थित रहते थे। इससे न केवल विद्यालय की नियमित शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हो रही थीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और अनुशासन व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि विद्यालय में उनका रवैया असहयोगात्मक रहा है और वे सहकर्मियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में असफल रहे। मामला उस समय और गंभीर हो गया जब वायरल इंटरव्यू में पवन कुमार ने मध्याह्न भोजन योजना को लेकर एक बेहद विवादित टिप्पणी कर दी। इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मध्याह्न भोजन में 10–15 प्रतिशत अधिक बच्चों की उपस्थिति दर्ज की जाती है और यह एक परंपरा है, जो लगभग सभी विद्यालयों में की जाती है। शिक्षा विभाग ने इस बयान को अत्यंत आपत्तिजनक माना। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इस तरह का सार्वजनिक वक्तव्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, विभागीय दिशा-निर्देशों और शिक्षक आचरण के स्पष्ट रूप से विरुद्ध है। शिक्षा विभाग के अनुसार, इस प्रकार के बयान न केवल अनुशासनहीनता को दर्शाते हैं, बल्कि सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करते हैं। साथ ही, इससे विभाग और सरकार की छवि को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है। इसी कारण जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय की ओर से पहले ही पवन कुमार से स्पष्टीकरण मांगा गया था। अपने जवाब में पवन कुमार ने यह स्वीकार किया कि इंटरव्यू में दिया गया बयान भूलवश था और उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था। हालांकि, विभाग ने स्पष्ट किया कि केवल स्वीकारोक्ति भर से मामला समाप्त नहीं हो जाता। जांच प्रतिवेदन, उपलब्ध साक्ष्यों और उनके पूर्व के आचरण की समीक्षा के बाद विभाग इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उन पर लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया प्रमाणित होते हैं। जांच में यह भी सामने आया कि शिक्षक द्वारा विभागीय आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की गई, विद्यालय में सकारात्मक कार्य वातावरण बनाए रखने में वे असफल रहे और उनके सार्वजनिक वक्तव्यों से विभाग की छवि धूमिल हुई। इन सभी तथ्यों को गंभीर मानते हुए शिक्षा विभाग ने विद्यालय विशिष्ट शिक्षक नियमावली 2023 एवं संशोधित नियमावली 2024 के तहत उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई शुरू की। इन्हीं प्रावधानों के तहत पवन कुमार को निलंबित कर दिया गया है। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी, रीगा का कार्यालय निर्धारित किया गया है। विभागीय नियमों के अनुसार, इस अवधि में उनकी उपस्थिति विवरणी के आधार पर उन्हें जीवन निर्वाह भत्ता देय होगा। साथ ही, शिक्षा विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि आरोप पत्र अलग से जारी किया जाएगा और आगे की विभागीय प्रक्रिया नियमानुसार पूरी की जाएगी। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरे तंत्र में अनुशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई है। विभाग ने साफ संदेश दिया है कि सरकारी योजनाओं, विशेषकर बच्चों से जुड़ी महत्वपूर्ण योजनाओं पर लापरवाही, अनियमितता या गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस पूरे मामले के बाद जिले के शिक्षा जगत में हलचल है। शिक्षक संगठनों और आम लोगों के बीच भी इस कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज है। कई लोग इसे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में सख्त लेकिन जरूरी कदम बता रहे हैं, तो वहीं कुछ इसे चेतावनी के रूप में देख रहे हैं कि सार्वजनिक मंचों पर बयान देते समय शिक्षकों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।
कुल मिलाकर, सीतामढ़ी का यह मामला न केवल एक शिक्षक के निलंबन तक सीमित है, बल्कि यह शिक्षा विभाग द्वारा अनुशासन और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए दिए गए कड़े संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।












