क्रोध से बढ़ता है मानसिक तनाव: बी.के. भगवान भाई
नौतन से फिरोज अंसारी की रिपोर्ट
क्षणिक क्रोध या आवेश मनुष्य को ऐसी भूल करवा बैठता है, जो कभी सुधर न सके। क्रोध से मानसिक तनाव बढ़ता है, विवेक नष्ट होता है। क्रोध मुर्खता से शुरू होता है और कई वर्षों बाद पश्चाताप के साथ समाप्त होता है। इससे मनोबल और आत्मबल कमजोर पड़ता है तथा अपराधों का मूल कारण बन जाता है। उक्त विचार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, माउंट आबू (राजस्थान) से पधारे बी.के. भगवान भाई ने व्यक्त किए। वे स्थानीय ब्रह्माकुमारी राजयोग सेवा केंद्र में ईश्वर प्रेमी भाई-बहनों को ‘क्रोध मुक्त जीवन हेतु सकारात्मक चिंतन’ विषय पर संबोधित कर रहे थे।भगवान भाई ने कहा कि मन में चलने वाले नकारात्मक विचार जैसे शंका, कुशंका, ईर्ष्या, घृणा, नफरत और अभिमान क्रोध की उत्पत्ति का कारण बनते हैं। क्रोध से दिमाग गरम हो जाता है, जिससे मस्तिष्क में विभिन्न रासायनिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इससे मानसिक बीमारियाँ, शारीरिक रोग, जीवन में रूखापन तथा रिश्तों में कड़वाहट आती है। मनमुटाव बढ़ता है, घर का वातावरण खराब होता है और बरकत समाप्त हो जाती है। क्रोध के कारण अनिद्रा, अशांति और तनाव बढ़ता है, जिससे व्यक्ति नशे-व्यसनों का शिकार हो सकता है। उन्होंने क्रोध मुक्ति के उपाय बताते हुए कहा कि सकारात्मक चिंतन से ही हम सहनशील और क्रोध मुक्त बन सकते हैं। सकारात्मक चिंतन मनोबल को मजबूत करता है, तनाव मुक्त जीवन प्रदान करता है तथा कई समस्याओं का स्वाभाविक समाधान कर देता है। हमारे विचारों का प्रभाव स्वयं, दूसरों, वातावरण, पेड़-पौधों और प्रकृति पर पड़ता है। यदि विचार सकारात्मक होंगे, तो प्रभाव भी सकारात्मक होगा। उन्होंने बताया कि जीवन को रोगमुक्त, दीर्घायु, शांतिपूर्ण और सफल बनाने के लिए सबसे पहले विचारों को सकारात्मक बनाना आवश्यक है। आध्यात्मिक ज्ञान सकारात्मक विचारों का प्रमुख स्रोत है। आध्यात्मिकता की परिभाषा देते हुए उन्होंने कहा—स्वयं को आत्मा के रूप में जानना, परमपिता परमात्मा को जानना तथा जीवन के असली उद्देश्य और कर्तव्य को समझना ही सच्ची आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिक ज्ञान से आत्मबल बढ़ता है और मनोबल मजबूत होता है। भगवान भाई ने कहा कि सत्संग से प्राप्त ज्ञान ही असली कमाई है, जिसे न चोर चुरा सकता है और न आग जला सकती है। हमें इसके लिए समय निकालना चाहिए। सत्संग से अच्छे संस्कार प्राप्त होते हैं और व्यवहार में सुधार आता है।राजयोग शिक्षिका बी.के. दीपशिखा ने राजयोग की महत्ता बताते हुए कहा कि राजयोग से संस्कार सतोप्रधान बनते हैं, इंद्रियों पर नियंत्रण आता है। क्रोध और तनाव मुक्त रहने के लिए रोजाना ईश्वर का चिंतन एवं गुणगान करना चाहिए। सकारात्मक चिंतन विपरीत परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखने की कला सिखाता है।स्थानीय ब्रह्माकुमारी सेवा केंद्र की संचालिका बी.के. उर्मिला बहन ने राजयोग की विधि समझाई। उन्होंने कहा कि स्वयं को आत्मा निश्चय करके चंद्र, सूर्य, तारों से परे परमशक्ति परमात्मा को याद करना, मन-बुद्धि से उन्हें देखना और उनके गुणों का गुणगान करना ही राजयोग है। इससे परमात्मा से मिलन का अनुभव होता है।कुंदन प्रसाद जी ने कहा कि राजयोग अभ्यास से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा, नफरत जैसे मनोविकारों पर विजय प्राप्त की जा सकती है और जीवन सद्गुणों से परिपूर्ण बन सकता है। कार्यक्रम में बी.के. निर्मला बहन और बी.के. सीमा बहन ने गुलदस्ता व तिलक लगाकर अतिथियों का स्वागत किया। प्रमोद भाई, सचिन, चंद्रमणि भाई और प्रिंसिपल रामपुकार भाई भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में सामूहिक मेडिटेशन किया गया।










