मौत का खनन और सोता प्रशासन
खबर उत्तरप्रदेश के बांदा जनपद से है जहां आज हम बात कर रहे हैं उस ‘सफेद ज़हर’ और ‘लाल लालच’ की, जिसने हमारे ज़िले की नसों को खोखला कर दिया है। जहाँ नियम ताक पर हैं, कानून घुटनों पर है और स्थानीय प्रशासन… वह शायद गहरी नींद में है या फिर नोटों की गड़गड़ाहट ने उसकी सुनने की शक्ति छीन ली है। देखिए, कैसे हमारी धरती का सीना चीरकर ‘खनन माफिया’ फल-फूल रहे हैं।
फोटो 1: ग्राउंड रिपोर्ट (खदान स्थल से
ये विजुअल्स किसी युद्ध क्षेत्र के नहीं हैं, बल्कि यह नज़ारा है जिला मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर नदी किनारे बसे गांव मरौली के समीप संचालित मोरम खदान खंड संख्या 4 और 5 का। यहाँ रात के सन्नाटे में नहीं, बल्कि दिन के उजाले में प्रशासन की नाक के नीचे धरती की कोख उजाड़ी जा रही है।
इस खंड की ये मशीनें गवाह हैं कि यहाँ कानून का खौफ खत्म हो चुका है। एनजीटी (NGT) के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। पानी का स्तर गिर रहा है, सड़कें टूट रही हैं,
लेकिन ताज्जुब की बात देखिए—कलेक्टर दफ्तर से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर चल रहे इस अवैध खेल की खबर ‘साहब’ को नहीं है!
वहीं ऑफ कैमरा दबी आवाज में ग्रामीणों का कहना है “साहब, धूल से सांस लेना मुश्किल है। रात भर ट्रक चलते हैं, बच्चे सो नहीं पाते। शिकायत करो तो गुंडे धमकाते हैं।”
रिपोर्टर (VO):
जनता चीख रही है, गुहार लगा रही है, लेकिन प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। क्या यह मान लिया जाए कि इन अवैध ट्रकों के पहियों को सरकारी रजामंदी का तेल मिल रहा है?
विजुअल
इस रिपोर्ट को देखने के बाद हमारी टीम स्थानीय प्रशासन से कुछ सीधे सवाल पूछती है:
सवाल 1
क्या बिना विभागीय मिलीभगत के हज़ारों टन खनिज रोज़ाना ज़िले की सीमा पार कर सकता है?
सवाल 2: जब ग्रामीण बार-बार लिखित शिकायत दे रहे हैं, तो कार्रवाई के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’ क्यों?
सवाल 3:
क्या खनन माफिया का रसूख स्थानीय अधिकारियों की कलम से ज़्यादा ताकतवर हो गया है?
निष्कर्ष (Closing)
तस्वीरें साफ हैं और नीयत भी। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियों को हम विरासत में सिर्फ गहरे गड्ढे और बंजर ज़मीन देंगे। हम इस खबर पर बने रहेंगे जब तक कि ज़िम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सी से उठकर धरातल पर नहीं आते। Banda se chalam Malik ki report










